Author: प्रो. ज्योति गौतम एवं कु. कुसुम
Affiliation: राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय, उदयपुर
Volume/Issue: Vol. 1 (Jan–June 2026)
Pages: 17–23
सारांश
दुर्गानंद सिन्हा का ‘सोशल साइकोलॉजी इन इंडिया’ भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान के विकास में एक आधारभूत कृति मानी जाती है, जिसने पश्चिमी मनोवैज्ञानिक ढाँचों के स्थान पर सांस्कृतिक रूप से संदर्भित ज्ञान-निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। यह शोध-पत्र आधुनिक भारतीय सामाजिक मूल्यों और मानकों के आलोक में उनके विचारों का आलोचनात्मक पुनर्मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। अध्ययन यह विश्लेषण करता है कि किस प्रकार सिन्हा ने भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता के सह-अस्तित्व, परिवार की केंद्रीय भूमिका, सांस्कृतिक मूल्यों और स्वदेशी मनोविज्ञान की अवधारणा को व्याख्यायित किया। साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण, शहरीकरण, लैंगिक समानता आंदोलनों और बदलती पारिवारिक संरचनाओं ने उनके सिद्धांतों को नए संदर्भ प्रदान किए हैं। शोध यह तर्क देता है कि यद्यपि सिन्हा का दृष्टिकोण आज भी अत्यंत प्रासंगिक है, फिर भी समकालीन भारतीय समाज की जटिलताओं को समझने के लिए उनके ढाँचे का विस्तार आवश्यक है। विशेष रूप से डिजिटल पहचान, बहुसांस्कृतिक प्रभाव और सामाजिक असमानताओं के नए रूपों ने सामाजिक मनोविज्ञान को अधिक बहुआयामी बना दिया है। यह अध्ययन निष्कर्षतः स्थापित करता है कि सिन्हा का योगदान भारतीय मनोविज्ञान को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जिसे आधुनिक संदर्भों में पुनर्परिभाषित करना आवश्यक है।
कुंजी शब्द: भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान, दुर्गानंद सिन्हा, सामाजिक मूल्य, सामाजिक मानक, स्वदेशी मनोविज्ञान, सांस्कृतिक मनोविज्ञान, परंपरा और आधुनिकता, वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण, पारिवारिक संरचना, लैंगिक समानता, सामाजिक परिवर्तन, पहचान निर्माण, बहुसांस्कृतिकता, सामाजिक व्यवहार, भारतीय संस्कृति, मनोवैज्ञानिक सिद्धांत, सामाजिक संरचना, मूल्य परिवर्तन।
