Author: डॉ. अवेश कुमार
Affiliation: पीएच.डी., जेआरएफ, बनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान
Volume/Issue: Vol. 1 (Jan–June 2026)
Pages: 92–96
सारांश
भारतीय संगीत के प्रमुख तत्त्वों में ताल का महत्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि लयात्मकता स्वतंत्र रूप से सभी में विद्यमान है, किन्तु उस लय के प्रमाण को निर्धारित करने में ताल प्रयोजनीय है। ताल के सुसंगत प्रयोग से संगीत में आनन्दवर्धक तत्त्व द्विगुणित हो जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र ग्रन्थ के 31वें अध्याय में पंचमार्गी तालों का विस्तृत विवेचन किया है। भरतमुनि ने पंचमार्गी ताल कहे हैं, जिनकी संख्या और स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मार्ग संगीत का प्रमुख प्रयोजन आत्मरंजन, ईश्वर आराधना और अदृष्ट फल की प्राप्ति है। मार्ग ताल भी मार्ग संगीत का ही एक अंग है। भरतकालीन संगीत में प्रमुख रूप से मार्ग तालों का प्रयोग होता था।
कुंजी शब्द: मार्ग, संगीत, मार्गताल, गुरु, लघु, यथाक्षर।
