Author: डॉ. नेहा जोशी
Affiliation: एसोसिएट प्रोफेसर, मंच कला संकाय, बनस्थली विद्यापीठ
Volume/Issue: Vol. 1 (Jan–June 2026)
Pages: 30–35
सारांश
भारतीय ज्ञान परंपरा में भगवद्गीता और भरत के नाट्यशास्त्र का विशेष स्थान है, क्योंकि दोनों ग्रंथ मानव जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक आयामों का गहन विवेचन प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य इन दोनों महान ग्रंथों के मध्य विद्यमान वैचारिक सामंजस्य, अंतर्संबंधों तथा उनकी समकालीन प्रासंगिकता का विश्लेषण करना है। भगवद्गीता जहाँ निष्काम कर्म, आत्मानुशासन, समत्व और लोककल्याण के सिद्धांतों को प्रतिपादित करती है, वहीं नाट्यशास्त्र रस, भाव, अभिनय और सौंदर्यबोध के माध्यम से मानव चेतना के परिष्कार का मार्ग प्रशस्त करता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि दोनों ग्रंथ मानव व्यक्तित्व के समग्र विकास, सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिक मूल्यों तथा भावनात्मक संतुलन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्तमान वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक संक्रमण, मानसिक तनाव और मूल्य-संकट के दौर में इन ग्रंथों की शिक्षाएँ विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होती हैं। यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि भगवद्गीता के कर्मयोग और नाट्यशास्त्र के रस-सिद्धांत का समन्वय आधुनिक समाज को मानवीय संवेदनशीलता, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक दिशा प्रदान कर सकता है। अतः इन दोनों ग्रंथों का पुनर्पाठ समकालीन सामाजिक एवं शैक्षिक विमर्श को समृद्ध करने की व्यापक संभावनाएँ रखता है।
मुख्य शब्द: भगवद्गीता, नाट्यशास्त्र, भरतमुनि, रस-सिद्धांत, कर्मयोग, भारतीय ज्ञान परंपरा, सौंदर्यशास्त्र, समकालीन प्रासंगिकता, सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्य।
